“राजऋषि सतयुगी होते हैं”

मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य

लोग यह जो कहते हैं द्वापर में राजऋषि थे, जिन्होंने बैठ यह वेद शास्त्र रचे क्योंकि वो त्रिकालदर्शी थे। अब वास्तव में राजऋषि हम सतयुग में ही कह सकते हैं क्योंकि वहाँ विकारों को पूरा जीते हुए हैं अर्थात् कमल के फूल समान जीवनमुक्त अवस्था में रहते राजाई चलाते हैं।

बाकी यह जो द्वापर में परमात्मा को प्राप्त करने के लिये तप करने वाले ऋषि हैं जिन्होंने वेद शास्त्र रचे हैं सतयुग में तो वेद शास्त्रों की जरुरत ही नहीं रहती, न हम उन्हों को त्रिकालदर्शी कह सकते हैं। जब हम ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को त्रिकालदर्शी नहीं कह सकते हैं तो फिर यह द्वापर युग वाले रजोगुण समय के ऋषि, मुनि कैसे त्रिकालदर्शी बन सकते हैं।

त्रिकालदर्शी अर्थात् त्रिमूर्ति, त्रिनेत्री सिर्फ एक परमात्मा शिव को कह सकते हैं, जो स्वयं इस कल्प के अन्त में आए सारी रचना का अन्त दे देते हैं। वहाँ सतयुग में प्रालब्ध भोगनी है, वहाँ यह ज्ञान नहीं रहता कि हम ब्रह्मावंशी ब्राह्मण ही सिर्फ मास्टर त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी बनते हैं, बाकी सारे कल्प के अन्दर कोई को भी ज्ञान नहीं मिल सकता है, न देवताओं को न मनुष्यों को त्रिकालदर्शी कह सकते हैं। अच्छा-ओम् शान्ति

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